Thursday, March 19, 2026

बचपन की यादें: कुछ हिन्दी में भी


त्रिशूल 
    

                                                                 हर्बट हाउस से हिमाद्री

                                                                  आज का हर्बट हाउस


                                                                 बादलों में तैरता हिमालय 




प्रांगण से हिमाला




भैरव का वाहन-बचपन से साथ 


                                                            ईजा की प्रिय- निम्मी तो नहीं



                                                          पुराना हर्बर्ट हाउस और हमारा सौल 


                                                                                समर्पण 



यह कविता संग्रह  हिमालय की गोद  को और मेरी माटी को समर्पित है  ,जहाँ मैं पैदा हुआ और बड़ा हुआ.'वीर भूमि'  और 'देव भूमि' मैं पैदा होने का सौभाग्य शायद विरलों को ही प्राप्त होता है.रानीखेत में  ' हर्बर्ट हॉउस ' के  प्रागंण में सौल के पेड़ के नीचे से बचपन का प्रारंभ हुआ.

पैत्रिक  गाँव ' मावडा ' से संस्कृति और संस्कारों की दीक्षा ली .संत, ज्ञानी व महापुरुषों के सानिध्य में बहुत कुछ सीखा ." वसुधैव कुटुम्बकम "हमारे घर में चरितार्थ और परिलक्षित था.न जाने कितने प्रबुद्ध  लोग 'कितने अतिथि ,कितने जाने अनजाने वहां पर रहकर पले ,पढाई लिखाई कर फले- फूले.

उम्र व संबंधों का  सदैव लिहाज होता था.सभी परिजन,भाई-बहन बहुत सम्मान से संबोधित होते थे.घर में सौहाद्र ,प्रेम,आदर व सम्मान ,सब धर्मों के प्रति निष्ठा ,बड़ों व गुरुजनों का सम्मान निहित था.

त्याग की प्रतिमूर्ति मेरी माता गंगा की तरह पवित्र, स्वच्छ,विराट ,अविरल व सहृदयता  की एक जीती जागती मिसाल थी.उनका नाम 'गंगा ' भी बहुत सोच  समझ कर रखा गया होगा.पढने की बहुत  शौक़ीन. उनकी एक अलग लाइब्रेरी रही.

दादा जी और पिता जी सत्य के पुजारी रहे.दादाजी पंडित गोबिंद बल्लभ पन्त जी के साथ रामजे अल्मोडा से लेकर  इलाहाबाद विश्वविद्यालय तक साथ - साथ पढ़े.

दादाजी हनुमान के परम भक्त थे और भैरब के अनन्य उपासक.उनका पहला नाम भी भैरब था.अँगरेज़ जज के सामने उनके एक मुक़दमे की पैरवी कौन कर गया, इसके लिए वो हनुमान लला के गुण गाते थे. भाव बिभोर  होकर कहते - अगर कपीश स्वयं उनके बदले नहीं आते तो उनका व्यवसाय खतरे में आ  जाता .

उन्होंने हमेशा एक काले श्वान को घर में रखा.काला श्वान भैरब का वाहन है.तब से लेकर आज तक यह  परंपरा अविरल है.

इजा को बिल्लियों का शौक था.उनकी बिल्लियों का नाम ' मधुबाला', 'अनारकली','निम्मी'इत्यादि होता था.

आश्चर्य है ,दादाजी और पिताजी के सफल वकालती पेशे के बावजूद हम दोनों भाइयों में से एक ने भी इस पेशे  को नहीं अपनाया.बड़े भाई साहेब एक आदर्श रहे -वो एक बहुत बड़े पद से सेवानिवृत्त  हुए.मैंने भी भारतीय सेना में भरसक योगदान दिया.

अपने आराध्यदेव भगवान  बदरी विशाल का बहुत आभारी हूँ . विकट समयों में ,सुख-दुःख व चुनौती भरे अवसरों पर, में अपने कर्तब्य से नहीं डिगा. 

भगवान शिव और हनुमान की विशेष कृपा रही .शनिदेव अति प्रबल होने के फलस्वरूप मेरे रक्षक हैं व उनका  सदेव   वरदहस्त है. जल-थल और वायु में अनेक बार मुझे बचाने वाले.

भगवन शंकर के त्रिशूल और हिमाद्री को नमन.कर्मठता और स्वावलंबन -दोनों की  द्योदक है हिमाला.

अति शीघ्र ' सोल  का पेड़' का द्वितीय संस्करण आने वाला है. 


3 comments:

  1. बहुत ही उत्तम लेख, पढ़ के आनंद आया । तस्वीरों ने आपकी यादों के वर्णन में चार चाँद लगा दिये है ।

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  2. Dada, ati uttam lekhan. Meri shubh KAAMNAAYEN. Please aise hi likhte rahen hamesha. Bachpan ki yaadein taaza ho gayin🎉💯🙏❤️🌄👍👍👍💓🌹💓🌹😊😊😊

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